मोहन मोरी, झाबुआ। अगर हौसलों में उड़ान हो और मन में कुछ कर गुजरने का जज्बा, तो गरीबी और संसाधनों का अभाव भी रास्ता नहीं रोक सकता। ऐसा ही कुछ कर दिखाया है झाबुआ जिले के छोटे से गांव कोटड़ा के एक किसान के बेटे दीपू परमार ने। विपरीत परिस्थितियों और बेहद कमजोर आर्थिक स्थिति से लड़ते हुए दीपू ने मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) की परीक्षा में गणित विषय से असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर चयन हासिल किया है। उन्होंने न सिर्फ अपने माता-पिता का सपना पूरा किया, बल्कि अपनी सफलता से पूरे जिले का नाम रोशन किया है।
बेहद कमजोर थी आर्थिक स्थिति, मजदूरी कर परिवार ने पाला सपना
इस सफलता के पीछे छिपी संघर्ष की कहानी बेहद भावुक करने वाली है। परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि दो वक्त की रोटी और पढ़ाई का खर्च उठाना एक बड़ी चुनौती थी। लेकिन बेटे की आँखों में शिक्षा की चमक देखकर माता-पिता और बड़े भाइयों ने कभी हार नहीं मानी। पिता और भाइयों ने दिन-रात दूसरों के खेतों और अन्य जगहों पर मजदूरी करके पैसे जुटाए, ताकि घर के सबसे छोटे सदस्य की पढ़ाई न छूटे। खुद तंगी में रहे, लेकिन भाई की किताबों और शिक्षा की जरूरतों को हमेशा सर्वोपरि रखा। पारिवारिक जीवन पूरी तरह संघर्षमय था, जहाँ हर दिन एक नया इम्तिहान होता था।
सरकारी स्कूल और सेल्फ स्टडी: अभावों को बनाया ताकत
आज के दौर में जहाँ लोग महंगी कोचिंग और प्राइवेट स्कूलों को सफलता की गारंटी मानते हैं, वहीं इस होनहार ने एक नई मिसाल पेश की है। उन्होंने अपनी शुरुआत से लेकर अंत तक की पूरी शिक्षा सरकारी स्कूल से ही पूरी की। गाँव के ही सरकारी स्कूल की टाट-पट्टी पर बैठकर अक्षरों को सीखा और गणित के कड़े सवालों को हल करना शुरू किया।
उच्च शिक्षा के लिये उज्जैन की ओर रुख किया
सबसे हैरान और प्रेरित करने वाली बात यह है कि, इस मुकाम तक पहुँचने के लिए उन्होंने कोई कोचिंग नहीं ली। महंगी कोचिंग की फीस भरने की हैसियत नहीं थी, इसलिए उन्होंने सेल्फ स्टडी (खुद से पढ़ाई) को ही अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया। दिन में स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई और रात को लालटेन या हल्की रोशनी में घंटों किताबों के साथ बिताना उनकी दिनचर्या बन गई थी।
शिक्षा को दिया सर्वोच्च महत्व
झाबुआ जिले के कोटड़ा जैसे ग्रामीण क्षेत्र में, जहाँ आज भी जागरूकता की कमी के कारण कई बच्चे पढ़ाई बीच में ही छोड़ देते हैं, इस परिवार ने शिक्षा के महत्व को सबसे ऊपर रखा। माता-पिता भले ही खुद अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे रहे हों, लेकिन वे जानते थे कि गरीबी के चक्रव्यूह को केवल शिक्षा के दम पर ही तोड़ा जा सकता है। उन्होंने अपनी पूरी जमापूंजी और मेहनत बेटे की शिक्षा में झोंक दी।
इनका रहा विशेष आर्थिक और नैतिक सहयोग
इस लंबी और कठिन यात्रा में यदि सबसे बड़ा सहारा कोई था, तो वह था उनका अपना परिवार। इस सफलता में किसी बाहरी संस्था से ज्यादा माता-पिता और बड़े भाइयों का अटूट आर्थिक और नैतिक सहयोग रहा। भाइयों ने अपने सुखों का त्याग कर भाई को पढ़ाया, तो माता-पिता ने हर कदम पर हौसला बढ़ाया। आज जब कोटड़ा का यह बेटा गणित का असिस्टेंट प्रोफेसर बनकर कॉलेज में छात्रों को पढ़ाएगा, तो यह सिर्फ उसकी नौकरी नहीं, बल्कि उस पूरे परिवार के पसीने और संघर्ष की जीत होगी जिसने मजदूरी करके एक प्रोफेसर को जन्म दिया है। यह कहानी झाबुआ और देश के हर उस ग्रामीण छात्र के लिए एक बड़ी प्रेरणा है जो संसाधनों की कमी का रोना रोते हैं।

