इंदौर। देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के गलियारों में इन दिनों कोई सामान्य नियुक्ति चर्चा का विषय नहीं है, बल्कि यह सवाल गूंज रहा है कि प्रतिभा आखिर किस कुर्सी पर बैठती है? इसी सवाल का जीवंत उत्तर बने हैं विश्वविद्यालय के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी प्रहलाद, जिनका चयन मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग (PSC) के माध्यम से केमिस्ट्री विषय में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में हुआ है।
यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की सफलता की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की भी है, जहां योग्य व्यक्ति वर्षों तक पहचान के इंतजार में फाइलों के बोझ तले दबा रहता है। प्रहलाद वर्षों से विश्वविद्यालय में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में कार्यरत थे। दिन में कार्यालयीन जिम्मेदारियां और रात में पाठ्यपुस्तकों से संवाद यही उनकी दिनचर्या थी।

विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. राकेश सिंघई के अनुसार, प्रहलाद का इंटरव्यू तक पहुंचना ही असाधारण उपलब्धि थी। उन्होंने बताया कि जब प्रहलाद पहली बार आशीर्वाद लेने आए, तो उनकी आंखों में डर कम और आत्मसंयम अधिक दिखाई दिया। बातचीत में यह स्पष्ट हो गया कि यह युवक केवल परीक्षा देने नहीं, बल्कि स्वयं को साबित करने निकला है।
PSC के परिणाम घोषित होते ही विश्वविद्यालय परिसर में भावनात्मक दृश्य देखने को मिला। जिन हाथों से अब तक फाइलें आगे बढ़ती थीं, उन्हीं हाथों में मिठाई का डिब्बा था। कर्मचारियों ने गर्व के साथ बताया कि “आज हमारा साथी प्रोफेसर बन गया है।” यह घटना शिक्षा व्यवस्था के भीतर छिपी उस सच्चाई को उजागर करती है, जहां कई प्रतिभाएं पद और पहचान के अभाव में सामने नहीं आ पातीं। प्रहलाद का चयन इस बात का प्रमाण है कि यदि अवसर निष्पक्ष हों, तो संस्थानों के भीतर ही ऐसे विद्वान मौजूद हैं, जो आने वाली पीढ़ियों को दिशा दे सकते हैं।

शिक्षाविदों का मानना है कि प्रहलाद की नियुक्ति केवल एक व्यक्ति की उन्नति नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय के लिए आत्ममंथन का अवसर भी है। यह सफलता बताती है कि शिक्षा संस्थान सिर्फ डिग्रियां देने की जगह नहीं, बल्कि सामाजिक गतिशीलता का मजबूत माध्यम भी हो सकते हैं। आने वाले दिनों में जब प्रहलाद किसी कॉलेज की प्रयोगशाला में छात्रों को रसायन विज्ञान पढ़ाएंगे, तब यह दृश्य याद दिलाएगा कि असली योग्यता वर्दी या पद से नहीं, बल्कि निरंतर अभ्यास और आत्मविश्वास से पहचानी जाती है।
देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के इतिहास में यह घटना एक मिसाल के रूप में दर्ज होगी जहां एक कर्मचारी ने अपने संघर्ष से व्यवस्था की सीमाओं को चुनौती दी और यह साबित किया कि प्रतिभा हमेशा रास्ता खोज लेती है।

